قصيدة الجرح


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ذات يوم ٍ..

حينما كنا سويّــا..

أبعثُ الدنيا إليك ِ..

و أراك ِ ! .. حاجةً أخرى لديَّ..


..

حاجةً.. ليست كـ مثل الباقيات..

كنت ِ أنت ِ ، بـ عيوني كل آت!

أولم أخبرْك ِ.. يا كلّ دَمِـي..

أنني كنتُ أرى فيك ِ الحيـــاة!

كنتِ أنت ِ.. طفلتي! حوريّـتي!

و فتاتي.. بل و كل الفتيات!

كنت ِ في عيني.. خيالاً شاعراً..

لم أرى مثلك ِ.. من بين البنات..

كنتُ أهواك ِ.. بـ عشق ٍ صادق ٍ..

كان في دمّـي.. لهيبُ الجَـمَـرات..

كنتُ أهواك ِ.. و كنت ِ غايتي..

و أرى فيك ِ جمال الـفـاتـنــات..

كنت ِ في روحي.. و كنت ِ في دمِـي..

و بأنفاسي.. و في كلّي.. صَـلاة!

كنتِ يا أجمل أنثى خِـلـتُـهــا..

مَـسّ روحي.. و هديل الأغنيات..

كنتُ دوماً.. في إلتهاب ٍ دائم ٍ..

يأكلُ الروحَ.. و يبقى في الرفاة !

كنتُ لا أشفى.. سوى في حضنك ِ..

حينَ أبكيك ِ.. بـ حرّ العَـبَـرات..

حينَ أُلقي جسدي.. في كَـنَـف ٍ..

أشتفي منه.. بـ كلّي ، و أبات!

حين أروي حاجتي.. في ضمّـة ٍ..

وارتشاف ٍ.. من معين ٍ كـ الصَفاة..

حين ألهو معك ِ.. في حالة ٍ..

بين إمساك ٍ بـ وعي ٍ.. و انفلات..

لم يكن في الدنيا.. شيءٌ أجملُ..

من سِـوانا.. حينما نصبح ذات!

...

هكذا.. قد عشتُ يوماً معك ِ..

خِـلـتُــه.. عِـقـداً ، و بعض السنوات..

و أفقتُ ! لا أرى إلا دمِـي..

و جروحاً.. دامياتٍ..قاتلات..

ليتني.. في الحبّ ما أعطيتكِ ..

بل و لم أعرْفك ِ.. بين الغانيات..

كنت ِ في يوم ٍ.. لهُ جاريةً..

ثم تأتيني.. بـ رسم الطاهرات..

لست ِ إلاّ.. قطعةً من بلل ٍ..

خارج ٍ منهُ.. و بالكادِ فتاة !

لست ِ إلا.. دُميـةً جالَ بها..

بـ رضاك ِ! .. و أنا كنتُ النجاة!

ليتك ِ.. كنت ِ معي ، لا معهُ..

و تخيّـرتِ طريق الناجيــــات..

لم أكن أفقدُ فيك ِ ثـقـةً..

بل سأحويك ِ.. و أنسى الماضيات..

إنما ماذا صنعت ِ حينها؟!

غير سوء ٍ ، كان أدهى السيئات..

و تخيّـرت ِ بقاء الوَسَــخ ِ..

في حناياك ِ.. و في كل الجهات..

و بقيت ِ.. بين قلب ٍ صادق ٍ..

هو قلبي! .. و مع الغير فتاة!

كنت ِ عندي.. تنكرين الولدَ

ثم ألوي.. باكتشاف الصَدَمــات..

أنك ِ لست ِ سوى ألعوبة ٍ..

بيد الأفّـاك.. مثل الجاريات..

حتى في أكثر ما يَـختصّـك ِ..

كالبريد ِ ! و خَـواص ٍ أُخريات..

يعرف السرّ و مـفتـاح الدخول ِ..

و يرى ما شاء منك ِ كــ الـعُـراة !

و رأى بالعين ِ.. ما أرسلتُـه..

و خواصّي.. و لهيبَ الكـلـمــات..

قولي بالله.. لماذا جئتني؟!

أوَكنت ِ حينها كـ الخاليات؟!

لست ِ إلا.. في ارتباط ٍ معـه..

و تُـعدّين من المرتبـطــات..

أخبريني.. غرضاً جئت ِ له؟!

ليتني أعلمُ.. عن سرّ الـغَـداة!

إنما لست ِ سوى خاسرة ٍ..

فـ خسرت ِ كل أنواع الصِــلات..

و أنا لم أخسر إلا صورةً..

خِـلتُك ِ فيها ، من المحترَمَـات..

و خرجت ِ مثلما أنت ِ هنا..

مِـلءَ عُرْي ٍ.. و كباقي العاريات.. .

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( 23ـ فبراير ـ 2008 )

السبت: السابعة مساءً